जब रक्तबीज का खून पीने के लिए माँ दुर्गा को लेना पड़ा यह सबसे भयानक रूप! जानिए महासप्तमी की यह रोंगटे खड़े करने वाली अमर कथा
शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन, यानी महासप्तमी को, आदिशक्ति के सबसे उग्र, विनाशकारी और साथ ही सबसे दयालु रूप—माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। इस स्वरूप को देखने मात्र से ही बुरी शक्तियां, भूत-प्रेत और काल भी थर-थर कांपने लगते हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि ममतामयी माँ को इतना भयंकर और काला रूप क्यों धारण करना पड़ा? इसके पीछे छुपी है शास्त्रों की वह सबसे प्रसिद्ध और रोंगटे खड़े कर देने वाली कथा, जब दानव रक्तबीज ने देवताओं पर विजय पा ली थी।
1. रक्तबीज का वह भयानक वरदान
पौराणिक कथाओं के अनुसार, शुंभ-निशुंभ के सेनापति रक्तबीज ने कठोर तपस्या से एक अत्यंत मायावी वरदान प्राप्त किया था। वरदान यह था कि युद्ध भूमि में जब भी उसके शरीर से खून की एक भी बूंद धरती पर गिरेगी, तो उस बूंद से ठीक वैसा ही बलवान और मायावी दूसरा रक्तबीज पैदा हो जाएगा।
इस वरदान के कारण जब भी देवता उस पर वार करते, उसके बहते खून से हजारों नए रक्तबीज पैदा हो जाते। देखते ही देखते रणभूमि में लाखों रक्तबीज योद्धा खड़े हो गए। देवता भयभीत हो गए और पराजित होने लगे।
2. जब रणभूमि में प्रकट हुईं माँ कालरात्रि
देवताओं की पुकार सुनकर माँ दुर्गा ने युद्ध संभाला। लेकिन जैसे ही उन्होंने रक्तबीज पर वार किया, उसका खून गिरते ही नए दानव पैदा होने लगे। तब माँ दुर्गा ने अपनी भृकुटी (क्रोध) से काल के समान विनाशकारी रूप—माँ कालरात्रि को प्रकट किया।
कालरात्रि का रूप: गहरा काला रंग, बिखरे हुए बाल, गले में बिजली जैसी चमकती माला, तीन धधकते नेत्र और गधे की सवारी। माँ के इस भयानक रूप को देखकर ही दानवों की सेना में भगदड़ मच गई।
3. खप्पर में पी लिया रक्तबीज का सारा खून
युद्ध को समाप्त करने के लिए माँ कालरात्रि ने एक अद्भुत और भयावह रणनीति अपनाई।
जैसे ही माँ दुर्गा ने अपने त्रिशूल से रक्तबीज पर प्रहार किया, माँ कालरात्रि ने तुरंत अपना विशाल खप्पर (पात्र) उसके गले के नीचे लगा दिया। उन्होंने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाली खून की एक-एक बूंद को हवा में और अपने खप्पर में ही झेल लिया।
माँ कालरात्रि ने उस खून की एक बूंद भी धरती पर गिरने नहीं दी।
जो भी रक्त गिरा, उसे माँ ने तुरंत पी लिया।
जो रक्तबीज पहले से पैदा हो चुके थे, माँ उन्हें भी निगलती गईं।
इस प्रकार, खून न गिरने के कारण नए दानव पैदा होना बंद हो गए और अंततः साक्षात् कालरात्रि ने रक्तबीज का समूल नाश कर दिया।
भयंकर हैं, फिर भी कहलाती हैं 'शुभंकरी'
भले ही माँ का यह रूप डरावना और उग्र है, लेकिन वे केवल दुष्टों और पापियों के लिए भयंकर हैं। अपने सच्चे भक्तों के लिए वे सदा ममतामयी और वरदान देने वाली हैं। वे भक्तों के जीवन से भय, रोग, शत्रु और अकाल मृत्यु के डर को मिटाती हैं, इसीलिए इन्हें 'शुभंकरी' भी कहा जाता है।
आज के दिन का विशेष भोग
गुड़ का भोग: माँ कालरात्रि को गुड़ अत्यंत प्रिय है। आज के दिन सुबह पूजा में माँ को गुड़ या गुड़ से बनी चीजों का भोग लगाने से जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं।
(यदि आपने कल महाषष्ठी पर भगवान श्रीराम के 'अकाल बोधन' की अद्भुत कथा नहीं पढ़ी है, तो यहाँ क्लिक करें।
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