'अकाल बोधन' का वह रहस्य, जब भगवान श्रीराम ने 108वां नीलकमल न मिलने पर अपनी आँख निकालने का संकल्प लिया था!

 

शारदीय नवरात्रि की महाषष्ठी को दुर्गा पूजा का महापर्व औपचारिक रूप से प्रारंभ होता है। इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण विधान है 'अकाल बोधन'।

​सामान्यतः देवता और देवियाँ आश्विन मास में शयन कर रहे होते हैं (दक्षिणायन के कारण)। परंतु लंका विजय से पूर्व प्रभु श्रीराम ने असामयिक रूप से (अकाल में) आदिशक्ति को जगाया था, इसलिए इसे 'अकाल बोधन' कहा जाता है।

​इस पूजा के पीछे एक ऐसी परीक्षा और समर्पण की कथा छिपी है, जो किसी भी सनातनी के रोंगटे खड़े कर देती है।

​108 दुर्लभ नीलकमल की खोज

​रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए ब्रह्मा जी के परामर्श पर भगवान श्रीराम ने समुद्र तट पर माँ दुर्गा की नौ दिवसीय आराधना का संकल्प लिया। पूजा के लिए एक कठोर नियम था कि माँ को 108 दुर्लभ नीलकमल (नीले कमल के फूल) अर्पित करने थे, जो केवल 'देवीदह' नामक अत्यंत दुर्गम सरोवर में खिलते थे।

​प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त पवनपुत्र हनुमान जी ने कठिन परिश्रम और पराक्रम से उस दुर्गम सरोवर से ठीक 108 नीलकमल लाकर प्रभु के चरणों में रख दिए।

​माँ दुर्गा की दिव्य परीक्षा और गायब हुआ एक कमल

​श्रीराम जब पूर्ण ध्यानमग्न होकर एक-एक मंत्र के साथ एक-एक नीलकमल माँ के चरणों में अर्पित कर रहे थे, तब माँ दुर्गा ने उनके समर्पण और निष्ठा की परीक्षा लेने का विचार किया।

​माँ ने अपनी माया से उन 108 कमलों में से आखिरी यानी 108वाँ नीलकमल गुप्त रूप से गायब कर दिया।

​जब श्रीराम 107 कमल अर्पित कर चुके और 108वें मंत्र के लिए हाथ बढ़ाया, तो थाल खाली था। पूजा का नियम था कि साधक बिना पूरा अनुष्ठान किए आसन से उठ नहीं सकता था, अन्यथा पूरी पूजा निष्फल हो जाती।

​'कमलनयन' का सर्वोच्च त्याग: जब श्रीराम ने बाण उठाया

​एक कमल की कमी से पूजा खंडित होने की स्थिति आ गई। प्रभु श्रीराम पल भर के लिए विचलित हुए, परंतु तभी उन्हें अपनी माता सुमित्रा और कौशल्या की वह बात याद आई कि वे बचपन में उन्हें 'राजीवलोचन' और 'कमलनयन' (कमल के समान नेत्रों वाले) कहकर पुकारती थीं।

​श्रीराम ने विचार किया: "यदि मेरे पास पुष्प नहीं है, तो क्या हुआ? मेरे दो नेत्र भी तो कमल ही हैं। पूजा पूर्ण करने के लिए मैं अपना एक नेत्र माँ के चरणों में समर्पित करूँगा।"

​यह सोचकर श्रीराम ने तुरंत अपना तरकश से बाण निकाला और अपनी दाहिनी आँख निकालने के लिए जैसे ही बाण आँख के पास ले गए...

​माँ दुर्गा का साक्षात् प्राकट्य

​उसी क्षण साक्षात् आदिशक्ति जगदम्बा ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हो गईं और उन्होंने अपने हाथों से प्रभु श्रीराम का हाथ पकड़ लिया।

​माँ दुर्गा की आँखों से वात्सल्य के आँसू बह रहे थे। उन्होंने कहा: "हे रघुनंदन! रुकिए! मैं आपकी भक्ति, निष्ठा और समर्पण से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मुझे 108वें कमल की आवश्यकता नहीं, आपका यह भाव ही संसार का सबसे बड़ा नैवेद्य है।"

​माँ दुर्गा ने श्रीराम को लंका विजय का अखंड आशीर्वाद दिया: "इष्ट सिद्धिर्भवतु" (तुम्हारे संकल्प की सिद्धि हो)। इसके बाद ही रावण का संहार संभव हो सका।

​महाषष्ठी पर हमें क्या सीख मिलती है?

​आज जब हम महाषष्ठी पर माँ के बोधन का दर्शन करते हैं, तो यह कथा हमें सिखाती है कि:

​ईश्वर को सोने-चांदी या बहुमूल्य वस्तुओं का लोभ नहीं है।

​वे केवल भक्त के अखंड समर्पण, संकल्प और निस्वार्थ प्रेम के भूखे हैं।

​("यदि आपने दुर्गा पूजा में बेल के पेड़ को निमंत्रण (बिल्व निमंत्रण) और कल्पारंभ का रहस्य नहीं पढ़ा है, तो यहाँ क्लिक करें।"

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