माँ दुर्गा की प्रतिमा में क्यों मिलाई जाती है वेश्यालय की मिट्टी? जानिए दुर्गा पूजा का सबसे गुप्त और पवित्र रहस्य!
शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा में माँ जगदम्बा की जो भव्य और दिव्य प्रतिमाएं हम पंडालों में देखते हैं, उनके निर्माण के पीछे सनातन धर्म का एक ऐसा गहरा रहस्य छिपा है, जिसे सुनकर आधुनिक युग का कोई भी व्यक्ति स्तब्ध रह जाएगा।
शास्त्रों के अनुसार, माँ दुर्गा की मृण्मयी (मिट्टी की) प्रतिमा तब तक पूर्ण और पूजनीय नहीं मानी जाती, जब तक कि उसमें 'निषिद्धो पल्ली' (वेश्यालय) की चौखट से लाई गई मिट्टी न मिलाई जाए। इस मिट्टी को सनातनी परंपरा में 'पुण्य माटी' कहा गया है।
आखिर एक पतित समझी जाने वाली जगह की मिट्टी साक्षात् जगतजननी की प्रतिमा में क्यों लगाई जाती है? इसके पीछे छिपे हैं तीन अत्यंत गहरे आध्यात्मिक और सामाजिक कारण:
1. समाज के समस्त पापों को बाहर छोड़ने का प्रतीक
सनातनी दर्शन के अनुसार, जब कोई भी व्यक्ति किसी वेश्यालय की चौखट के भीतर कदम रखता है, तो वह अपनी सारी पवित्रता, शील, अच्छे संस्कार और पुण्य उस चौखट के बाहर ही छोड़ जाता है।
अतः, उस चौखट पर समाज के सभी पुरुषों के 'पुण्य' संचित हो जाते हैं। इसलिए पुजारी स्वयं जाकर हाथ जोड़कर उस चौखट की मिट्टी मांगता है, ताकि उस संचित पवित्रता (पुण्य माटी) से माँ की देह का निर्माण हो सके।
2. सामाजिक तिरस्कार के विरुद्ध सनातन का नारी-सम्मान
सनातन धर्म किसी भी स्त्री को हीन या अछूत नहीं मानता। समाज भले ही उन स्त्रियों को हेय दृष्टि से देखता हो और मुख्यधारा से अलग कर देता हो, परंतु माँ भगवती के दरबार में कोई त्याज्य नहीं है।
माँ दुर्गा साक्षात् नारी शक्ति हैं।
उनकी प्रतिमा में उस उपेक्षित स्त्री के आँगन की मिट्टी मिलाकर सनातन धर्म यह संदेश देता है कि ईश्वर की दृष्टि में कोई अछूत नहीं है और समाज की सबसे उपेक्षित नारी के सहयोग के बिना स्वयं माँ जगदम्बा का उत्सव भी अधूरा है।
3. माँ की प्रतिमा के लिए 4 पवित्र स्थानों की मिट्टी
शास्त्रीय विधान के अनुसार, माँ की प्रतिमा बनाने के लिए केवल वेश्यालय ही नहीं, बल्कि चार प्रमुख स्थानों की मिट्टी को मिलाया जाता है:
गंगा जी के दोनों तटों की मिट्टी (पवित्रता का प्रतीक)
गौशाला की मिट्टी (कामधेनु और वात्सल्य का प्रतीक)
राजा के महल या राजदरबार की मिट्टी (ऐश्वर्य और संप्रभुता का प्रतीक)
वेश्यालय के आँगन की मिट्टी (उपेक्षितों के उद्धार और पुण्य का प्रतीक)
जब ये चारों मिट्टियाँ एक साथ मिलती हैं, तभी साक्षात् आदिशक्ति की शक्ति उस प्रतिमा में समाहित होने योग्य बनती है।
सनातन धर्म की विशाल सोच
यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और यह सिखाती है कि सनातन धर्म संकीर्ण नहीं, बल्कि कितना विराट और समावेशी है। जहाँ आधुनिक समाज केवल भेदभाव करना सिखाता है, वहीं हमारी प्राचीन परंपरा समाज की सबसे उपेक्षित दहलीज को भी नमन करना सिखाती है।
( "यदि आपने दुर्गा पूजा में बेल के पेड़ को निमंत्रण (बिल्व निमंत्रण) देने का रहस्य नहीं पढ़ा है, तो यहाँ क्लिक करें।"
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